विभा एक चित्रकार थी। उसका सपना था—एक ऐसी तस्वीर बनाना जो दुनिया देखे और हैरान रह जाए। वह दिन-रात उस तस्वीर पर काम करती रहती। कैनवास पर रंगों की बौछार होती—लाल, नीला, हरा, पीला। लेकिन हर बार कुछ न कुछ अधूरा रह जाता।
पूरी तस्वीर
स्थिर, बंद, खत्म
कुछ नया नहीं हो सकता
अधूरी तस्वीर
खुली, जीवित, बन रही है
नई संभावनाएँ
एक दिन विभा की माँ उसके कमरे में आई। उसने देखा—कमरे में दर्जनों अधूरी तस्वीरें बिखरी पड़ी थीं। कुछ आधी रंगी हुई, कुछ पर सिर्फ रेखाएँ, कुछ खाली कैनवास। माँ ने पूछा— “बेटा, ये सब क्यों अधूरी हैं?” विभा ने कहा— “माँ, मुझे लगता है कि मैं कभी पूरी तस्वीर नहीं बना पाऊँगी। हर बार कुछ न कुछ कमी रह जाती है।”
विभा ने अपनी अधूरी तस्वीरों को देखा। वास्तव में, हर अधूरी तस्वीर में कुछ खास था। एक में आधा चेहरा था—जो बहुत गहरा लग रहा था। दूसरी में आधा पेड़ था—जिसकी जड़ें गहरी थीं। एक में सिर्फ एक आँख थी—जो बहुत कुछ कह रही थी।
अधूरेपन को स्वीकारने के चरण
विभा ने अपनी अधूरी तस्वीरों की एक प्रदर्शनी लगाई। नाम रखा— ‘अधूरी तस्वीरें: अधूरेपन की सुंदरता’। लोग आए और हैरान रह गए। उन्होंने कहा— “ये तस्वीरें तो पूरी लगती हैं!” विभा मुस्कुराई— “यही तो अधूरेपन की सुंदरता है। यह पूरा लगता है, लेकिन पूरा नहीं है। और यही इसकी खासियत है।”
आज विभा एक जानी-मानी कलाकार है। लेकिन उसकी सबसे पसंदीदा तस्वीर वही है जो अधूरी है—एक आधा बना हुआ चेहरा, जिसकी एक आँख में आँसू है और दूसरी में मुस्कान। वह कहती है— “यह मैं हूँ। अधूरी, लेकिन जीवित। अधूरी, लेकिन सुंदर। अधूरी, लेकिन सच्ची।”
अपने अधूरेपन को गले लगाइए। वह आपकी कमजोरी नहीं, आपकी ताकत है। क्योंकि जो अधूरा है, वही तो बन सकता है। जो पूरा है, वह तो बन चुका।