प्रोफेसर अरुण अपनी आखिरी क्लास ले रहे थे। चालीस साल तक उन्होंने दर्शनशास्त्र पढ़ाया था, और आज उनकी सेवानिवृत्ति का दिन था। क्लासरूम में एक विदाई का माहौल था, लेकिन अरुण के चेहरे पर शांति और संतुष्टि की मुस्कान थी।
"मेरे प्रिय विद्यार्थियों," उन्होंने कहा, "आज मेरी आखिरी क्लास है। और इस अंतिम क्लास में, मैं आपसे केवल एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ: क्या वास्तव में कुछ भी समाप्त होता है?"
क्लास में सन्नाटा छा गया। फिर एक छात्र ने हाथ उठाया, "सर, मौत के बारे में क्या? क्या वह अंत नहीं है?"
अरुण मुस्कुराए, "एक कहानी सुनो। मेरे गाँव में एक बूढ़ा बरगद का पेड़ था। सदियों पुराना। एक दिन आँधी में वह गिर गया। गाँव वालों ने सोचा कि पेड़ का अंत हो गया। लेकिन अगले वसंत में, उसी स्थान पर नई पौधें फूट आईं। उस पेड़ के बीज, जो सालों से जमीन में सोए हुए थे, अब नए पेड़ बन रहे थे।"
चक्र दर्शन #1
प्रकृति में कोई रेखीय रेखा (लीनियर लाइन) नहीं है—सभी कुछ चक्रीय (साइक्लिकल) है। पत्ता गिरता है, सड़ता है, मिट्टी बनता है, और वही मिट्टी नए पत्ते को जन्म देती है। यही अनंत शुरुआत का रहस्य है।
अरुण ने आगे कहा, "मेरे जीवन के चालीस साल इस क्लासरूम में बीते। आज यह अध्याय समाप्त हो रहा है। लेकिन क्या सच में समाप्त हो रहा है? मेरे द्वारा पढ़ाए गए विचार—वे तो अब आपके मन में रहेंगे। आप उन्हें आगे बढ़ाएँगे। मेरा ज्ञान अब आपका ज्ञान बन गया है।"
बीज
शुरुआत की संभावना
विकास
अनुभव और सीख
फलन
परिणाम और उपलब्धि
पुनर्जन्म
नई शुरुआत
"समाप्ति शब्द ही भ्रामक है," अरुण ने जारी रखा। "हम जिसे अंत कहते हैं, वह वास्तव में रूपांतरण है। बर्फ पिघलकर पानी बनती है—क्या बर्फ समाप्त हुई? नहीं, वह बस रूप बदल गई। इसी तरह, हर अनुभव, हर संबंध, हर अध्याय—सब कुछ रूप बदलता रहता है।"
चक्र दर्शन #2
जल चक्र की तरह है जीवन: वाष्प बनकर उड़ना (शुरुआत), बादल बनना (विकास), बारिश के रूप में गिरना (परिणाम), और नदी में बहकर फिर वाष्प बनना (पुनर्जन्म)। कोई नष्ट नहीं होता, सिर्फ़ रूप बदलता है।
क्लास के अंत में, अरुण ने अपने विद्यार्थियों को एक आखिरी उपहार दिया—हर एक को एक बीज। "इसे बोएँगे," उन्होंने कहा। "और जब यह पौधा बनेगा, तो याद रखना कि यह मेरा नहीं, बल्कि उस अनंत श्रृंखला का हिस्सा है जो हम सब को जोड़ती है।"
सेवानिवृत्ति के बाद, अरुण ने अपना समय एक छोटी सी लाइब्रेरी बनाने में लगाया। उन्होंने अपने जीवन भर की किताबें दान कर दीं। एक दिन, उनका पूर्व छात्र मिलने आया। "सर," उसने कहा, "आपकी वह आखिरी क्लास मेरी ज़िंदगी बदल गई। मैंने अपनी नौकरी छोड़कर एक स्कूल शुरू किया है।"
अरुण की आँखें चमक उठीं। "देखो," उन्होंने कहा, "मेरी क्लास समाप्त हुई, लेकिन मेरा शिक्षण जारी है—अब तुम्हारे माध्यम से। यही है अनंत शुरुआत।"
चक्र दर्शन #3
अनंत का चिह्न (∞) सिर्फ़ एक प्रतीक नहीं—यह जीवन का सत्य है। ऊपर का लूप समाप्त होता है, नीचे का लूप शुरू होता है, और यह चलता रहता है। हर अंत बिंदु एक नई शुरुआत बिंदु है।
वर्षों बीत गए। अरुण अब इस दुनिया में नहीं थे, लेकिन उनकी लाइब्रेरी फल-फूल रही थी। उनके छात्र का स्कूल अब एक प्रसिद्ध संस्थान बन चुका था। और वे बीज जो अरुण ने दिए थे—वे अब पूरे पार्क में फैले हुए थे, वृक्ष बन चुके थे।
एक दिन, अरुण के पोते ने अपने पिता से पूछा, "दादाजी कहाँ हैं?"
पिता ने उसे पार्क में ले जाकर एक पेड़ दिखाया। "देखो," उन्होंने कहा, "यह पेड़ दादाजी के दिए बीज से उगा है। इसकी छाया में बैठकर लोग पढ़ते हैं। इसकी शाखाओं पर पक्षी गाते हैं। दादाजी समाप्त नहीं हुए—वे बस रूप बदल गए।"
और फिर उसने अपने बेटे को एक बीज दिया। "इसे बोओ," उन्होंने कहा। "और याद रखो—जो तुम बोओगे, वही काटोगे। और जो काटोगे, वही फिर बोओगे। यही है अनंत का नृत्य।"