राहुल के जीवन में सब कुछ परफेक्ट था। एक अच्छी नौकरी, शानदार अपार्टमेंट, दोस्तों का समूह, और एक स्थिर जीवन। फिर भी, हर सुबह जब वह ऑफिस जाने के लिए तैयार होता, तो उसे एक अजीब सी खालीपन महसूस होती। वह खुद से पूछता, "क्या यही सब है? क्या इसी के लिए मैंने इतनी मेहनत की थी?"
एक शाम, ऑफिस से लौटते समय, वह एक पुराने पार्क के पास से गुज़रा। बचपन में वह इस पार्क में घंटों बिताया करता था, पेड़ों के नीचे बैठकर कहानियाँ पढ़ता था। उस दिन, किसी अज्ञात आकर्षण से खिंचा हुआ, वह पार्क में चला गया। वहीं एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे, एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह राहुल का इंतज़ार कर रहा हो।
राहुल ने पूछा, "आप यहाँ अकेले बैठे हैं?"
बुजुर्ग मुस्कुराए, "अकेला? नहीं बेटा, मैं तो अपने साथ बातें कर रहा हूँ। तुम भी कभी अपने साथ बात करते हो?"
राहुल को यह सवाल अजीब लगा। "अपने साथ बातें? क्यों करें?"
"क्योंकि अंदर की आवाज़ सबसे महत्वपूर्ण बात कहती है," बुजुर्ग ने कहा। "तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारा दिल क्या चाहता है?"
यह सवाल राहुल के मन में घर कर गया। वह रोज़ की भागदौड़ में इतना व्यस्त था कि कभी रुककर खुद से यह सवाल नहीं पूछा था। उस रात, वह बिस्तर पर लेटा हुआ सोचता रहा। टीवी की आवाज़, फोन की नोटिफिकेशन, दोस्तों के मैसेज—सब कुछ बंद करके, जब उसने पूरी तरह से शांति महसूस की, तो उसे एक धीमी सी आवाज़ सुनाई दी।
वह आवाज़ कह रही थी: "मैं चित्रकार बनना चाहता था। मैं रंगों से बातें करना चाहता था। मैं लोगों की कहानियाँ कैनवास पर उतारना चाहता था।"
राहुल की आँखें खुल गईं। यह सच था! बचपन में वह घंटों तस्वीरें बनाया करता था। उसकी माँ अक्सर कहती थी, "तुम्हारे हाथों में जादू है।" लेकिन समय के साथ, उसने इस "जादू" को भुला दिया था। समाज ने उसे समझाया था कि सफलता का मतलब है—एक स्थिर नौकरी, अच्छी सैलरी, सामाजिक मान्यता।
अगले दिन, राहुल ने अपने ऑफिस के ड्रॉवर से एक पुरानी स्केचबुक निकाली, जो सालों से वहीं पड़ी थी। उसने पेंसिल उठाई और बिना सोचे-समझे कुछ रेखाएँ खींचनी शुरू कर दीं। उसके हाथ याद कर रहे थे—वह भावना, वह आनंद, वह संतुष्टि जो उसे रंगों और रेखाओं से मिलती थी।
हफ्तों बीत गए। राहुल ने हर रात थोड़ा समय निकालकर स्केचबुक में कुछ न कुछ बनाना शुरू किया। पहले तो उसे लगा कि उसकी कला खो गई है, लेकिन धीरे-धीरे उसके हाथ फिर से जीवित हो उठे। एक दिन, उसने अपना पहला पूरा पेंटिंग बनाया—एक पेड़ के नीचे बैठा हुआ बुजुर्ग, जिसकी आँखों में अनंत ज्ञान झलक रहा था।
जब उसने यह पेंटिंग अपने कमरे में लगाई, तो उसे एहसास हुआ कि उसके भीतर का खालीपन भरने लगा है। वह आवाज़—जिसे उसने सालों तक अनसुना किया था—अब उसकी सबसे अच्छी दोस्त बन चुकी थी। उसने नौकरी नहीं छोड़ी, लेकिन उसने अपने जीवन में संतुलन ढूंढ लिया। वह समझ गया कि सफलता का मतलब केवल बाहरी उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि आंतरिक संतुष्टि भी है।
कहानी का अंत एक नए शुरुआत की तरह था। राहुल ने एक छोटी सी आर्ट वर्कशॉप शुरू की, जहाँ वह बच्चों को पेंटिंग सिखाता था। उसके छात्र अक्सर पूछते, "सर, आपको इतनी सुंदर कला बनाना कैसे आता है?"
राहुल मुस्कुराता और कहता, "बस अपनी अंदर की आवाज़ सुनो। वह तुम्हें वह सब सिखा देगी, जो तुम्हें जानना चाहिए।"