रोहित एक प्रतिभाशाली युवक था। उसने इंजीनियरिंग की थी, अच्छे नंबरों से पास हुआ था। लेकिन नौकरी नहीं मिल रही थी। हर इंटरव्यू में उससे कुछ न कुछ कमी निकल आती। धीरे-धीरे रोहित ने खुद को कोने में बंद कर लिया। उसने सोचना शुरू कर दिया— “मैं शायद किसी काम का नहीं हूँ। मेरी किस्मत ही खराब है। मैं कभी सफल नहीं हो सकता।”
दीवारों के अंदर
“मैं नहीं कर सकता”
“मेरी किस्मत खराब है”
“मैं असफल हूँ”
दीवारों के बाहर
“मैं कोशिश कर सकता हूँ”
“मैं सीख सकता हूँ”
“मैं सफल हो सकता हूँ”
रोहित के पिता को यह देखकर बहुत दुख होता था। एक दिन उन्होंने रोहित को एक पुराना बक्सा दिया। बक्से में बचपन की कुछ चीज़ें थीं—रोहित की पहली ड्राइंग, उसकी पहली ट्रॉफी, और एक छोटी सी डायरी।
रोहित ने डायरी खोली। पहले पन्ने पर लिखा था— “मैं बड़ा होकर एक बड़ा इंजीनियर बनूंगा। मैं दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी में काम करूंगा। और मैं अपने मम्मी-पापा के लिए एक बड़ा घर बनाऊंगा।”
उस दिन रोहित ने एक फैसला लिया। उसने अपने दिमाग की दीवारों को तोड़ना शुरू किया। उसने अपनी कमजोरियों को पहचाना, लेकिन उन्हें अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उसने नई स्किल्स सीखीं, अपना नेटवर्क बढ़ाया, और छोटी-छोटी नौकरियों से शुरुआत की।
कुछ सालों बाद, रोहित एक बड़ी कंपनी में सीनियर इंजीनियर था। लेकिन इससे भी बड़ी बात—उसने अपने भीतर की दीवारों को तोड़ लिया था। अब वह युवाओं को मेंटर करता है और उनसे कहता है—
आज रोहित उसी डायरी को अपने बेटे को देता है—जो 10 साल का है। वह उससे कहता है— “बेटा, अपने सपने लिखो। कोई दीवार मत बनने दो। और जब कोई कहे कि तुम नहीं कर सकते, तो उन्हें अपनी डायरी दिखाना।”