एक छोटी सी मोमबत्ती थी। उसका नाम था—दीपा। वह एक पुराने मंदिर के कोने में रखी थी। रोज़ शाम को पुजारी उसे जलाता, और वह अपनी रोशनी से पूरे मंदिर को आलोकित कर देती। दीपा को अपनी रोशनी पर गर्व था। लेकिन एक दिन, तूफान आया। हवा इतनी तेज़ थी कि मंदिर के दरवाज़े हिलने लगे।
हवा ने दीपा से कहा— “तू क्या समझती है अपने आप को? मैं तो तुझे एक झोंके में बुझा दूंगी।” दीपा डरी नहीं। उसने कहा— “तू चाहे जितना जोर लगा ले, मैं अपनी रोशनी नहीं छोड़ूंगी।”
दीपा (मोमबत्ती)
“मैं नहीं बुझूंगी। मेरी रोशनी उन लोगों के लिए है जो अंधेरे में हैं।”
हवा
“तुझे मेरी परवाह नहीं? देखती हूँ कितनी देर टिकती है।”
हवा ने ज़ोर लगाया। दीपा की लौ लहराने लगी। वह बुझने को थी, लेकिन दीपा ने हार नहीं मानी। उसने अपनी लौ को छोटा कर लिया—जितनी ज़रूरत थी, उतनी ही। उसने खुद को बचाने के लिए एक दीवार का सहारा लिया। हवा चाहे कितनी भी तेज़ चले, दीपा की रोशनी बची रही।
सुबह हुई। तूफान थम गया। मंदिर के बाहर का दृश्य तबाह था—पेड़ उखड़े हुए थे, दीवारें गिरी हुई थीं। लेकिन दीपा अब भी जल रही थी। उसकी लौ शांत थी, लेकिन उससे निकलने वाला प्रकाश उतना ही तेज़ था जितना पहले कभी नहीं था।
पुजारी ने जब देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने दीपा से कहा— “तूने हमें सिखाया कि सबसे बड़ी ताकत बाहर नहीं, अंदर होती है।”
उस दिन के बाद दीपा मंदिर की ‘अजर अमर ज्योति’ बन गई। लोग उसे देखने दूर-दूर से आते थे। उसकी कहानी मुंह-मुंह पर थी—कैसे एक छोटी मोमबत्ती ने तूफान का सामना किया और बच निकली।
दीपा ने अपनी एक बात पुजारी से कही थी— “मैं जानती हूँ कि एक दिन मेरा मोम खत्म हो जाएगा, और मैं बुझ जाऊंगी। लेकिन जब तक मैं हूँ, तब तक मैं रोशनी दूंगी। और जब मैं नहीं रहूंगी, तो मेरी रोशनी उन लोगों के दिलों में रहेगी जिन्होंने मुझे देखा है।”
आज वह मोमबत्ती नहीं है। लेकिन उस मंदिर में आज भी एक दीया जलता है—उसी चिराग से। और हर शाम, पुजारी उसे जलाते हुए कहता है— “दीपा, तू हमेशा जलती रह।”
तो अगर आज आपके जीवन में तूफान आया है—हवाएँ चल रही हैं, अंधेरा घना हो रहा है—तो याद रखिए। आप उस मोमबत्ती की तरह हैं। अपनी रोशनी को छोटा कीजिए, जरूरत के हिसाब से ढलिए, लेकिन बुझने मत दीजिए। क्योंकि हर तूफान के बाद, एक नई सुबह होती है। और उस सुबह, आपकी रोशनी दूसरों के लिए प्रेरणा बनेगी।