अमर नाम का एक युवक था। उसके जीवन में सब कुछ था—घर, परिवार, दोस्त, नौकरी। लेकिन फिर भी वह अंदर से खाली महसूस करता था। उसे लगता था—कुछ तो कमी है। वह खुशी की तलाश में था, लेकिन उसे पता नहीं था कि वह कहाँ मिलेगी।
एक दिन अमर अपने गाँव के पुराने मंदिर में गया। वहाँ एक बूढ़ा साधु बैठा था। अमर ने उससे पूछा— “बाबा, मुझे खुशी नहीं मिल रही। क्या आप बता सकते हैं कि खुशी कहाँ मिलेगी?” साधु मुस्कुराया और बोला— “बेटा, तू खुशी को बाहर ढूंढ रहा है। वह तो तेरे अंदर है।”
साधु ने अमर को एक छोटा-सा दीया दिया और कहा— “इसे ले जा। रोज़ शाम को इसे जलाना। जब तक यह जलेगा, तब तक तू अपने अंदर की रोशनी देख पाएगा।” अमर ने दीया लिया और घर लौट आया।
रोशनी की खोज के चरण
अमर ने पहले यह माना कि उसके अंदर अंधेरा है। बाहर की रोशनी कितनी भी हो, अंदर अंधेरा था। यह पहली सीढ़ी थी—स्वीकार।
अमर ने रोज़ दीया जलाया। धीरे-धीरे उसे अपने अंदर एक छोटी सी लौ महसूस होने लगी—जो खुशी, शांति और संतोष से जल रही थी।
कुछ महीनों बाद अमर को लगा—अब उसके अंदर रोशनी है। वह खुशी बाहर नहीं, अंदर ढूंढता था। और पाया—वह हमेशा से वहीं थी।
अमर ने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी, घर नहीं छोड़ा, जंगल नहीं गया। उसने बस एक चीज़ बदली—दृष्टि। उसने खुशी को बाहर ढूंढना बंद किया, और अंदर ढूंढना शुरू किया। उसे पता चला कि जो खुशी वह चारों तरफ ढूंढ रहा था, वह उसकी साँसों में, उसकी नींद में, उसकी चाय की चुस्की में, उसकी माँ के आशीर्वाद में थी।
आज अमर हर शाम को अपना दीया जलाता है। वह उसे नहीं जलाता इसलिए कि वह अंधेरे से डरता है, बल्कि इसलिए कि वह अपने अंदर की रोशनी को याद रखना चाहता है। वह हर किसी से कहता है—
तो अगर आज आपको लगता है कि आप खुश नहीं हैं, कि कुछ कमी है—तो अपनी आँखें बंद कीजिए। गहरी साँस लीजिए। अपने दिल की धड़कन सुनिए। वह रोशनी वहीं है—आपके भीतर। बस उसे देखने की जरूरत है।
और जब आप उसे देख लेंगे, तो पाएंगे—आपने जो खोजा था, वह हमेशा से आपके पास था।