अर्जुन परेशान था। उसके मन में हर समय एक ही सवाल घूमता रहता था— “समय क्यों बीत जाता है? जो पल बीत गए, वे कहाँ चले गए? क्या उन्हें वापस लाया जा सकता है?” वह अपने दादा के पास गया, जो उसके लिए हमेशा ज्ञान के भंडार थे।
अर्जुन हैरान था— “समय से बातचीत? कैसे?” दादा ने उसे अपने पास बिठाया और कहानी सुनानी शुरू की।
दादा ने आगे बताया— “अर्जुन, जो पल बीत गए, वे तुम्हारे पीछे नहीं हैं। वे तुम्हारे अंदर हैं। तुम जो भी हो, जो कुछ भी जानते हो, वह उन बीते हुए पलों की देन है। उन्हें वापस लाने की कोशिश मत करो। उनसे सीखो, और आगे बढ़ो।”
दादा ने अर्जुन को एक डायरी दी। उस पर लिखा था— “मेरा समय, मेरी कहानी।” उन्होंने कहा— “रोज़ एक पल को लिखो। खुशी का, गम का, सीख का। जब तुम यह करोगे, तो तुम समय के साथ दोस्ती करोगे। और फिर तुम देखोगे कि समय तुम्हारे साथ है, तुम्हारे खिलाफ नहीं।”
अर्जुन ने दादा की बात मानी। उसने हर रोज़ एक पल लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि समय अब उसे दौड़ाने वाला नहीं लगता, बल्कि उसके साथ चलने वाला लगता है। उसने गलतियों से सीखा, अच्छे पलों को सेहत किया, और हर दिन को जीने लगा।
कई साल बीत गए। दादा अब नहीं रहे, लेकिन उनकी डायरी आज भी अर्जुन के पास है। वह अक्सर उसे खोलता है और पढ़ता है। और हर बार उसे लगता है मानो दादा उससे बात कर रहे हैं।
अर्जुन आज खुद बच्चों को सिखाता है— “समय से मत डरो। उसे समझो। वह तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त बन सकता है। बस उसके साथ चलना सीखो, उसके खिलाफ नहीं।” और हर बच्चे को वह एक डायरी देता है, जिस पर लिखा होता है— “मेरा समय, मेरी कहानी।”
तो आज से ही, समय से बातचीत शुरू करो। अपने बीते हुए कल से सीखो, अपने आज को जियो, और अपने कल को संवारो। क्योंकि समय तुम्हारा साथी है, दुश्मन नहीं।