दादाजी के कमरे में एक पुरानी लकड़ी की दराज़ थी। उस पर ताला लगा रहता था। बच्चे हमेशा पूछते— “दादाजी, इस दराज़ में क्या है?” दादाजी मुस्कुराकर कहते— “बीता हुआ समय।”
दादाजी की दराज़ में
एक दिन उनका पोता रोहन उनके पास आया। उसने कहा— “दादाजी, मुझे अपनी दराज़ दिखाइए।” दादाजी मुस्कुराए। उन्होंने ताला खोला। दराज़ में पुरानी चीज़ें थीं—पुराने ख़त, पुरानी तस्वीरें, एक पुरानी घड़ी, कुछ टिकट, एक डायरी, और एक छोटी सी अंगूठी।
दादाजी ने एक-एक करके सब चीज़ें निकालीं। पहले एक पुरानी तस्वीर— “यह तुम्हारी दादी के साथ मेरी पहली तस्वीर है। हम दोनों कॉलेज में मिले थे।” फिर एक पुराना टिकट— “यह मेरी पहली नौकरी की ट्रेन का टिकट है।” फिर एक पुरानी घड़ी— “यह मेरे पिता की घड़ी है। उन्होंने मुझे दी थी जब मैंने पहली बार अपनी दुकान खोली थी।”
समय की परतें
बचपन
मासूमियत, खेल, और सपने। यह वह समय है जब हमें कोई डर नहीं होता।
जवानी
जोश, मेहनत, और संघर्ष। यह वह समय है जब हम दुनिया जीतना चाहते हैं।
जिम्मेदारी
परिवार, करियर, और समाज। यह वह समय है जब हम दूसरों के लिए जीते हैं।
अनुभव
शांति, ज्ञान, और स्मृतियाँ। यह वह समय है जब हम दूसरों को सिखाते हैं।
दादाजी ने डायरी निकाली। वह उनकी पुरानी डायरी थी, जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ लिखी थीं। उन्होंने कहा— “रोहन, ये डायरी मेरी सबसे बड़ी दौलत है। इसमें मेरी सारी सीखें लिखी हैं—मेरी गलतियाँ, मेरी जीत, मेरे आँसू, मेरी मुस्कान।”
रोहन ने डायरी पढ़नी शुरू की। पहले पन्ने पर लिखा था— “आज मैंने अपनी पहली नौकरी छोड़ी। मुझे नहीं पता कि यह सही फैसला है या गलत। लेकिन मैं अपनी दुकान खोलना चाहता हूँ।” आगे लिखा था— “दुकान शुरू की। नुकसान हुआ। लेकिन मैंने हार नहीं मानी।” फिर लिखा था— “आज मेरी दुकान ने पहला मुनाफा कमाया।”
उस दिन के बाद रोहन ने अपनी खुद की दराज़ बनाई। उसमें उसने अपनी पहली घड़ी, अपना पहला मेडल, अपनी पहली डायरी रखी। वह हर महीने उसे खोलता है और अपनी यात्रा देखता है—कहाँ से शुरू किया और कहाँ पहुँचा।
आज दादाजी नहीं हैं। लेकिन उनकी दराज़ अभी भी है—रोहन के पास। वह अक्सर उसे खोलता है, उन पुरानी चीज़ों को छूता है, और दादाजी को याद करता है। उसे लगता है—दादाजी वहीं हैं, उन यादों में, उन सीखों में।
क्योंकि जो बीत गया, वह लौटता नहीं। लेकिन जो सिखा गया, वह हमेशा रहता है। और यही सबसे बड़ी दौलत है।