सीमा एक छोटे से गाँव में रहती थी। उसका गाँव अपने रंगों के लिए मशहूर था—कभी होली के रंग, कभी कपड़ों के रंग, कभी फसलों के रंग। लेकिन यही रंग धीरे-धीरे लोगों के बीच दीवारें बन गए थे।
लाल
जोश और ऊर्जा
नीला
शांति और गहराई
हरा
प्रकृति और उम्मीद
पीला
खुशी और रोशनी
गाँव में दो समुदाय थे—एक लाल रंग के कपड़े पहनता था, दूसरा नीले रंग के। सालों पहले किसी छोटी-सी बात पर झगड़ा हुआ था, और अब वही रंग पहचान बन चुके थे। लाल वाले कहते—‘हम अलग हैं।’ नीले वाले कहते—‘हम बेहतर हैं।’ बच्चे भी अलग-अलग खेलते थे।
सीमा बहुत परेशान थी। उसके दोस्त दोनों समुदायों में थे, लेकिन वे एक साथ नहीं खेल सकते थे। एक दिन उसने अपनी दादी से पूछा— “दादी, लाल और नीले में क्या फर्क है?” दादी ने कहा— “बेटा, कोई फर्क नहीं है। बस लोगों ने बना लिया है।”
अगले दिन, सीमा ने गाँव के चौराहे पर एक बड़ा-सा कैनवास लगाया। उसने उस पर आकाश बनाना शुरू किया—नीला भी, लाल भी, पीला भी, हरा भी। लोग इकट्ठा हो गए। “यह क्या बना रही है?” उसने कहा— “आकाश।” लोग हँसे— “आकाश का एक ही रंग होता है।”
रास्ते अलग-अलग हैं, लेकिन मंज़िल एक है।
हम अलग-अलग हैं, लेकिन इंसानियत एक है।
सीमा की बात सुनकर गाँव सन्न रह गया। एक बच्ची ने उन्हें वह सिखा दिया जो बड़े भूल गए थे—भेदभाव के पीछे कोई वजह नहीं थी। बस एक पुरानी आदत थी। उसी दिन, एक लाल कपड़े वाले बच्चे ने नीले कपड़े वाले बच्चे से हाथ मिलाया। “चलो साथ में खेलते हैं। आकाश तो सबका एक ही है।”
उस दिन के बाद गाँव बदल गया। होली पर सबने साथ में रंग खेले। त्योहार पर सबने एक साथ मिठाई खाई। बच्चे अब रंगों से परे दोस्त थे। और हर शाम, सीमा अपने कैनवास पर आकाश बनाती—हर दिन अलग रंग, लेकिन हर दिन वही आकाश।
सीमा की कहानी आज कई गाँवों में सुनाई जाती है। और हर बार, जब लोग रंगों के नाम पर लड़ने लगते हैं, कोई न कोई कहता है— “रुको। पहले बताओ, आकाश का क्या रंग है?”
आसमान की तरह बनो—सबको अपने अंदर समेटो। बादलों को, सूरज को, चाँद को, सितारों को। और याद रखो—यही आकाश तुम्हारे ऊपर भी है, तुम्हारे नीचे भी, तुम्हारे अंदर भी।