विकास को अपने दादाजी की पुरानी कोठी विरासत में मिली थी। वह घर जहाँ उसके पिता पले-बढ़े थे, जहाँ दादाजी ने अपनी आख़िरी साँसें ली थीं। घर को मरम्मत की ज़रूरत थी, और विकास ने फैसला किया कि वह इसे संभालकर रखेगा।
मरम्मत के दौरान, एक मज़दूर ने पुरानी अलमारी के पीछे से एक लकड़ी का बक्सा निकाला। बक्सा धूल से ढका था, उस पर ताले की जगह एक पुराना ताला लगा था जो जंग खा चुका था। विकास ने बक्सा खोला—अंदर पुराने पत्र, तस्वीरें, और दस्तावेज़ थे।
विकास ने पत्रों को ध्यान से पढ़ना शुरू किया। ये उसके दादाजी के समय के थे—कुछ अंग्रेज़ी में, कुछ हिंदी में। तस्वीरों में युवा दादाजी थे, एक युवती के साथ जो दादी नहीं थी। एक पत्र विशेष रूप से उसका ध्यान खींचा—यह 1947 का था, विभाजन के समय का।
पारिवारिक संबंध
(1915-1998)
(1948-2015)
पत्र की भाषा काव्यात्मक थी, भावनाओं से भरी हुई। यह एक युवती ने लिखा था जिसका नाम नूरजहाँ था। पत्र से पता चला कि दादाजी और नूरजहाँ प्यार करते थे, लेकिन विभाजन ने उन्हें अलग कर दिया। नूरजहाँ का परिवार पाकिस्तान चला गया, और दादाजी यहीं रह गए।
विकास हिल गया। उसे अपने दादाजी के बारे में यह रहस्य कभी पता नहीं था। दादाजी हमेशा खामोश और गंभीर रहते थे। अब वह समझ रहा था कि उस खामोशी में कितना दर्द दबा था।
लाहौर, 15 सितंबर 1947
प्रिय रामनाथ,
यह शायद मेरा आख़िरी पत्र होगा तुम्हारे नाम। कल हम रवाना हो रहे हैं। माँ ने कहा है—यहाँ अब हमारे लिए जगह नहीं। तुम्हारे लिए भी नहीं।
तुम्हें याद है वो शाम जब हम रावी के किनारे बैठे थे? तुमने कहा था—"नूर, इंसान की कोई सरहद नहीं होती।" आज मैं समझ रही हूँ, इंसान की नहीं, लेकिन देशों की सरहदें होती हैं। और ये सरहदें दिलों को भी तोड़ देती हैं।
मैं तुमसे एक वादा चाहती हूँ। जीवन जीना। प्यार करना। खुश रहना। मेरी याद को अपने दिल का बोझ मत बनने देना। तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है।
हम कभी नहीं मिल पाएंगे, यह जानते हुए भी मैं तुमसे कहती हूँ—मैं तुम्हें हमेशा याद रखूंगी। हर चाँदनी रात में, हर बहार में, हर फूल की खुशबू में तुम्हारी याद आएगी।
अलविदा, मेरे प्यारे। अलविदा।
तुम्हारी,
नूरजहाँ
लेकिन यादों के आईने में हम हमेशा साथ रहेंगे।"
विकास की आँखें नम हो गईं। उसे अपने दादाजी पर दया आ रही थी। एक ऐसा प्यार जो कभी पूरा नहीं हो पाया। एक ऐसी कहानी जो कभी कही नहीं गई।
विकास ने बाकी पत्र भी पढ़े। कुछ और भी रहस्य सामने आए। दादाजी ने नूरजहाँ के परिवार की मदद की थी जब वे पाकिस्तान जा रहे थे। उन्होंने अपनी कुछ ज़मीन बेचकर उन्हें पैसे दिए थे। यह सब गुप्त रखा गया था, क्योंकि उस समय ऐसी मदद खतरनाक थी।
विकास ने फैसला किया कि वह इस कहानी को संरक्षित करेगा। उसने पत्रों को डिजिटाइज़ किया, तस्वीरों को स्कैन किया। उसने एक वेबसाइट बनाई—"1947 की अनकही कहानियाँ"। उस पर उसने दादाजी और नूरजहाँ की कहानी डाली, साथ ही और भी ऐसी कहानियाँ जो विभाजन में खो गईं।
एक दिन विकास को एक ईमेल मिला। ईमेल पाकिस्तान से था—नूरजहाँ की पोती ने लिखा था। उसने वेबसाइट देखी थी और पहचान लिया था कि यह उसकी दादी की कहानी है। नूरजहाँ 2010 में गुज़र गई थीं, लेकिन उन्होंने अपने परिवार को रामनाथ के बारे में बताया था।
विकास और नूरजहाँ की पोती ज़रा ने वीडियो कॉल की। उन्होंने कहानियाँ साझा कीं। ज़रा ने बताया कि नूरजहाँ हमेशा एक लकड़ी का बक्सा संभालकर रखती थीं। उसमें रामनाथ के पत्र और एक तस्वीर थी।
आख़िर में, विकास ने अपने पिता के बारे में सोचा। क्या उन्हें इस रहस्य के बारे में पता था? शायद नहीं। कभी-कभी माता-पिता अपने बच्चों को दर्द से बचाने के लिए अपने दर्द छिपा लेते हैं।
विकास ने घर की मरम्मत पूरी की। लेकिन अब वह घर उसके लिए सिर्फ़ एक इमारत नहीं था। यह एक कहानी थी। एक इतिहास था। एक प्यार की निशानी थी। उसने एक कमरे को संग्रहालय बना दिया—उसमें पत्रों की प्रतियाँ, तस्वीरें, और उस समय की यादगार चीज़ें रखी थीं।
आज, विकास का बेटा उन पत्रों को पढ़ता है और पूछता है: "पापा, दादाजी इतने साहसी थे?" विकास मुस्कुराता है और कहता है: "हाँ, बेटा। और तुम्हारी कहानी भी उतनी ही सुंदर होगी।"
क्योंकि हर पत्र के पीछे एक कहानी होती है। और हर कहानी के पीछे एक इंसान। और हर इंसान के पीछे एक प्यार जो कभी नहीं मरता।