1998 की सर्दियाँ थीं। उस वक्त न तो स्मार्टफोन थे, न व्हाट्सऐप। दूर बैठे अपनों से जुड़ने का एक ही ज़रिया था—लैंडलाइन फोन और वो लंबी-लंबी कॉल्स, जिनमें बस आवाज़ होती थी, पर एहसास अनगिनत।
आनंद और मीरा की शादी को दो साल हुए थे। आनंद की नौकरी दुबई में थी, और मीरा जयपुर में अपने मायके में। हर रविवार सुबह 10 बजे का इंतज़ार रहता—उनके मिलने का वक्त। उस ज़माने में अंतरराष्ट्रीय कॉल महंगी थी, इसलिए दोनों ने तय किया था कि वे हर हफ्ते सिर्फ 10 मिनट बात करेंगे। लेकिन 10 मिनट में क्या बातें होतीं? बस इतना कि “ठीक हूँ,” “तुम्हारी याद आती है,” और “अगले हफ्ते फिर बात करेंगे।”
एक दिन, आनंद ने खुशखबरी दी— “मीरा, मैं अगले महीने छुट्टियों में आ रहा हूँ। पूरे 15 दिन!” मीरा की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने सोचा, इस बार वह उसे बताएगी कि वह माँ बनने वाली है।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
अगले ही रविवार, जब मीरा ने फोन मिलाया, तो दूसरी तरफ एक अजनबी की आवाज़ आई— “यह नंबर बंद हो चुका है।” उसने सोचा, शायद नेटवर्क प्रॉब्लम है। एक हफ्ते, दो हफ्ते, महीने बीत गए। कोई खबर नहीं। चिट्ठियाँ लौट आईं, दोस्तों ने बताया कि दुबई में आनंद की कंपनी बंद हो गई और वह कहीं और चला गया।
मीरा के पास बस यादें थीं और उसके गर्भ में पलता एक बच्चा।
साल बीतते गए। मीरा ने अपने बेटे अंश को अकेले पाला। उसने कभी शिकायत नहीं की, बस हर रविवार सुबह 10 बजे वह उस पुराने फोन के पास बैठ जाती, कान पर रिसीवर रखती, और एक टूटी हुई लाइन की फीं-फीं सुनती रहती। मानो आवाज़ अभी आएगी।
2023 की बात है। अंश अब बड़ा हो गया था और मुंबई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। एक दिन उसने सोचा, क्यों न माँ के लिए वही पुराना फोन नंबर ढूँढा जाए। शायद कहीं आर्काइव में मिल जाए। उसने कई पुराने रिकॉर्ड खंगाले, दूरसंचार विभाग से संपर्क किया। पता चला कि वह नंबर अब एक वृद्धाश्रम में इस्तेमाल हो रहा था।
अंश ने वह नंबर मिलाया। दूसरी तरफ से एक बूढ़ी आवाज़ आई— “हैलो?” अंश ने कहा, “मैं अंश बोल रहा हूँ, मीरा का बेटा।” लाइन पर सन्नाटा छा गया। फिर एक ठंडी साँस आई और आवाज़ काँपी— “मीरा... वह मीरा जो जयपुर में रहती थी?”
वह आवाज़ आनंद की थी। बूढ़ा, अकेला, और टूटा हुआ आनंद। उसने बताया कि कैसे वह दुबई से निकला, कैसे उसकी कंपनी बंद हुई, और कैसे वह मानसिक बीमारी की चपेट में आकर सड़कों पर भटकता रहा। सालों बाद उसे होश आया, तो वह भारत लौटा, लेकिन मीरा को ढूँढने की हिम्मत नहीं हुई। वह एक वृद्धाश्रम में चला गया, बस उसी नंबर को अपने पास रखा, जो कभी उसके घर का था।
अगले ही रविवार, सुबह 10 बजे, मीरा उस वृद्धाश्रम के सामने खड़ी थी। अंश ने उसे वहाँ पहुँचाया था। दरवाज़ा खुला। सामने एक बूढ़ा, सफेद बालों वाला आदमी खड़ा था। आँखों में आँसू, हाथ काँप रहे थे। मीरा ने उसे देखा, और बस इतना बोली—
आनंद के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह रो पड़ा। उसने मीरा के पैर पकड़ लिए। “मुझे माफ कर दे,” वह बस इतना कह पाया।
उस दिन फोन नहीं, 25 सालों की दूरी मिटी थी।
आज वह टूटा हुआ फोन मीरा के घर में एक शीशे के केस में रखा है। उसके नीचे लिखा है— “इस फोन ने कभी काम नहीं किया, लेकिन इसने हमें जोड़े रखा। क्योंकि आवाज़ें लाइनों में नहीं, दिलों में सफर करती हैं।”
आनंद और मीरा अब साथ हैं। वे हर रविवार सुबह 10 बजे वृद्धाश्रम में जाकर उन बुज़ुर्गों से मिलते हैं जिनकी आवाज़ें किसी का इंतज़ार कर रही हैं। आनंद कहता है, “मैंने 25 साल खो दिए, पर आवाज़ ने मुझे वापस मेरे घर का रास्ता दिखा दिया।”
और मीरा? वह अब भी उस फोन के पास बैठती है। अब इसलिए नहीं कि उसे किसी आवाज़ का इंतज़ार है, बल्कि इसलिए कि उसे यकीन है— जो आवाज़ सच्ची होती है, वह कभी नहीं मरती। वह लौट के ही आती है।