एक छोटे से गाँव में एक बूढ़ा संत रहता था। उसकी कुटिया के सामने हमेशा लोगों की भीड़ लगी रहती। लोग दूर-दूर से उसके पास सलाह लेने आते। संत बहुत कम बोलता था, लेकिन उसके हर शब्द में एक अद्भुत शक्ति थी—जैसे जादू।
गाँव की एक युवती, पार्वती, बहुत दुखी रहने लगी थी। उसके पति ने उससे बोलना बंद कर दिया था। घर का माहौल जहर जैसा हो गया था। निराश होकर वह संत के पास पहुँची।
संत ने कुछ नहीं कहा। वह उठा और कुटिया के पीछे लगे गुलाब के पौधे के पास ले गया। उसने पार्वती को एक कोमल कली तोड़ने को कहा। पार्वती ने हाथ बढ़ाया, लेकिन कांटों ने उसकी उंगली चीर दी।
पार्वती कुछ समझी नहीं। संत ने समझाया—"तुम्हारे शब्द भी ऐसे ही हैं। सच कहने की जल्दी में तुम कांटों (कठोरता) को पकड़ लेती हो, और कोमल कली (रिश्ता) खो देती हो।"
अगले दिन, संत ने पार्वती को एक प्रयोग करने को कहा। अगले सात दिन, वह अपने पति से केवल वही बातें कहे जो उसके मन को सुकून देती हों। भले ही उसे गुस्सा आए, चुप रहे। बस अच्छे शब्द बोले।
पहले दिन पार्वती ने मुश्किल से मुँह खोला। उसने बस इतना कहा, "खाना बन गया है।" पति ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन खाना खा लिया। दूसरे दिन उसने कहा, "आज बहुत धूप थी, आपने पानी पिया?" पति ने सिर हिलाया।
चौथे दिन, पति ने खुद बात शुरू की—"तुम आजकल अलग क्यों बात करती हो?" पार्वती ने बस मुस्कुराकर कहा, "बस ऐसे ही।" पांचवें दिन पति ने चाय लाते हुए कहा, "तुमने मेरी पसंद की चाय बनाई।"
सातवें दिन की सुबह, पति ने पार्वती का हाथ थाम लिया। "माफ कर दो मुझे। मैं भूल गया था कि शब्दों की क्या कीमत होती है। तुमने मुझे सिखा दिया।" पार्वती की आँखों में आँसू थे—इस बार दर्द के नहीं, खुशी के।
जब पार्वती संत को धन्यवाद देने गई, तो संत ने कहा, "मैंने कुछ नहीं किया। बस यह याद दिलाया कि शब्द सिर्फ आवाज़ नहीं, वे ऊर्जा हैं। जैसी ऊर्जा दोगे, वैसी वापस मिलेगी।"
कुछ महीनों बाद, गाँव में एक और घटना घटी। एक बच्चा, जो जन्म से गूँगा था, पहली बार बोला—"माँ"। उसकी माँ ने सालों तक उससे बात की थी, बिना यह जाने कि वह सुन भी पाता है या नहीं। डॉक्टरों ने कहा था, "होप मत रखो।" लेकिन माँ ने हर दिन कहा, "बेटा, तुम बोल सकते हो। तुम्हारी आवाज़ दुनिया सुनेगी।"
एक दिन, बच्चे के मुँह से आवाज़ निकली। पूरा गाँव दौड़ा आया। लोग कह रहे थे, "चमत्कार!" लेकिन माँ ने कहा, "चमत्कार नहीं, शब्दों का जादू है। मैंने उसके कानों में वे बीज बोए जो उसे सुनाई नहीं देते थे, लेकिन उसकी आत्मा ने सुन लिए।"
उस माँ की कहानी जंगल की आग की तरह फैल गई। लोग समझ गए कि शब्दों में कितनी ताकत है। जिन परिवारों में कलह थी, वहाँ शांति आई। जहाँ नफरत थी, वहाँ प्यार जगा। सबने एक ही बात सीखी—शब्दों का जादू सिर्फ कहानियों में नहीं, हमारे जीवन में हर पल बिखरा है।
आज वह गूँगा बच्चा एक कवि है। उसकी कविताएँ देश भर में पढ़ी जाती हैं। वह कहता है, "मेरी माँ ने मुझे शब्द दिए, तब जब मैं सुन भी नहीं सकता था। उनके शब्द मेरे भीतर उतर गए और एक दिन फूट पड़े। अब मैं वही कर रहा हूँ—उन लोगों तक शब्द पहुँचा रहा हूँ जो खुद को सुनाई नहीं देते।"
संत अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कुटिया के सामने आज भी लोग इकट्ठा होते हैं। वहाँ एक पत्थर पर खुदा है:
पार्वती और उसका पति अब दूसरों को सिखाते हैं कि कैसे शब्द रिश्तों को जोड़ सकते हैं। वे कहते हैं, "शब्दों का जादू कोई रहस्यमयी मंत्र नहीं है। यह बस यह याद रखना है कि हर शब्द एक तोहफा है। इसे सोच-समझकर दें।"
और शायद यही सबसे बड़ा सच है। शब्द सिर्फ अक्षरों का समूह नहीं, वे भावनाओं के वाहक हैं, इरादों के दूत हैं, और आत्माओं के स्पंदन हैं। जो इसे समझ गया, उसने जीवन का सबसे बड़ा मंत्र पा लिया।