बूढ़े राम सिंह जी एक छोटे से कमरे में रहते थे। कमरे में दो खिड़कियाँ थीं—एक पूर्व की ओर, एक पश्चिम की ओर। सुबह होते ही राम सिंह जी पूर्व की खिड़की के पास जाते और बैठ जाते।
एक दिन उनका पड़ोसी राजेश उनसे मिलने आया। राजेश ने देखा कि राम सिंह जी हमेशा पूर्व की खिड़की से ही बाहर देखते हैं। उसने पूछा, "राम सिंह जी, आप कभी दूसरी खिड़की से क्यों नहीं देखते?"
राम सिंह जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "राजेश बेटा, मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूँ। पहले मैं भी केवल पश्चिम की खिड़की से देखता था।"
राजेश को आश्चर्य हुआ। "क्यों? उसमें क्या खास है?"
"चलो, आज मैं तुम्हें दोनों खिड़कियों का अंतर दिखाता हूँ," राम सिंह जी ने कहा।
पहली खिड़की (पश्चिम)
दूसरी खिड़की (पूर्व)
राजेश दोनों खिड़कियों से बाहर देखता रहा। वह समझ गया कि दोनों खिड़कियाँ एक ही दुनिया दिखा रही थीं, लेकिन अलग-अलग कोण से।
राम सिंह जी ने कहानी सुनानी शुरू की, "बीस साल पहले मेरी पत्नी का देहांत हो गया। मेरे बच्चे विदेश चले गए। मैं अकेला रह गया। उस समय मैं केवल पश्चिम की खिड़की से देखता था। मुझे सब कुछ उदास और निराशाजनक लगता था।"
"फिर क्या हुआ?" राजेश ने पूछा।
"एक दिन मेरा पोता आया। उसने कहा, 'दादा, यह खिड़की तो बहुत बोरिंग है। चलो दूसरी खिड़की से देखते हैं।' उस दिन मैंने पहली बार पूर्व की खिड़की से बाहर देखा। और मेरी जिंदगी बदल गई।"
नज़रिया बदलने के चरण
खोजना
पहले यह पहचानें कि आप किस नकारात्मक दृष्टिकोण में फंसे हैं
स्थान बदलना
खुद को भौतिक या मानसिक रूप से एक अलग स्थान पर ले जाएँ
देखने का कोण बदलना
उसी स्थिति को एक अलग कोण से देखने का प्रयास करें
अपनाना
नए दृष्टिकोण को अपनाएँ और उसके सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान दें
राजेश ने पूछा, "लेकिन राम सिंह जी, क्या पश्चिम की खिड़की से दिखने वाली समस्याएँ असली नहीं हैं? कचरा, भीड़, गंदगी—ये सब तो वास्तविक हैं।"
राम सिंह जी ने समझाया, "बिल्कुल वास्तविक हैं, बेटा। लेकिन सवाल यह नहीं है कि क्या वास्तविक है। सवाल यह है कि तुम किस पर ध्यान देना चुनते हो।"
राजेश ने सोचा कि वह भी तो अपने जीवन में हमेशा पश्चिम की खिड़की से ही देखता है। उसे हर चीज में कमी दिखती थी। नौकरी में तनख्वाह कम, घर में जगह कम, जीवन में खुशी कम।
"मैं कैसे बदलूँ?" राजेश ने पूछा।
राम सिंह जी ने कहा, "रोज सुबह पांच मिनट के लिए दूसरी खिड़की से देखने का अभ्यास करो। नहीं, खिड़की से नहीं। अपने मन की खिड़की से। अपनी किसी समस्या को लो और उसे एक अलग कोण से देखने की कोशिश करो।"
राजेश ने वादा किया कि वह यह अभ्यास करेगा। वह घर लौटा और पहली बार अपनी जिंदगी को दूसरी खिड़की से देखने की कोशिश की।
एक महीने बाद राजेश फिर राम सिंह जी से मिलने आया। उसके चेहरे पर एक नई चमक थी। "राम सिंह जी, मैंने आपकी सलाह मानी। मैंने दूसरी खिड़की से देखना शुरू किया।"
"और क्या हुआ?" राम सिंह जी ने पूछा।
"मुझे पता चला कि मेरी नौकरी में तनख्वाह कम है, लेकिन मेरे पास एक स्थिर आय है। मेरा घर छोटा है, लेकिन उसमें प्यार भरा है। मेरे पास कम है, लेकिन जो है उसके लिए मैं आभारी हूँ।"
राम सिंह जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब तुम समझ गए। दुनिया नहीं बदली, तुम्हारा नजरिया बदला। और जब नजरिया बदलता है, तो पूरी दुनिया बदल जाती है।"
आज राम सिंह जी नहीं हैं, लेकिन उनकी शिक्षा आज भी जीवित है। राजेश ने एक छोटा सा समूह बनाया है—"दूसरी खिड़की क्लब"। इसमें लोग आते हैं और सीखते हैं कि कैसे जीवन को एक अलग नजरिए से देखा जाए।
हर सदस्य को एक कार्य मिलता है: "आज कम से कम एक चीज को दूसरी खिड़की से देखो।"
क्योंकि सच यह है कि हम सबके पास दो खिड़कियाँ हैं। एक जो अंधेरा दिखाती है, और एक जो रोशनी। चुनाव हमेशा हमारा है। आज तुम किस खिड़की से देखोगे?