अमित एक सफल सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। उसकी नौकरी अच्छी थी, घर बड़ा था, गाड़ी नई थी। लेकिन एक दिन, जब वह ऑफिस से घर लौट रहा था, तो अचानक एक विचित्र अनुभव हुआ।
ट्रैफिक सिग्नल पर रुकते हुए उसने अचानक खुद से पूछा: "मैं कौन हूँ?"
यह सवाल अमित के मन में घर कर गया। घर पहुँचकर उसने आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा। चेहरा वही था, लेकिन कुछ अलग लग रहा था। उसे लगा जैसे वह अपने आप को नहीं पहचान पा रहा है।
अगले दिन ऑफिस में, जब सब उसे "अमित सर" कहकर बुला रहे थे, तो उसे अजीब लगा। उसने सोचा: "क्या मैं सिर्फ 'अमित सर' हूँ? या मैं इससे कहीं अधिक हूँ?"
यह संदेह दिन-ब-दिन बढ़ता गया। अमित ने अपनी डायरी में लिखा: "आज मुझे लगता है कि मैं अपने आप को भूलता जा रहा हूँ। मैं वही बन गया हूँ जो दूसरे मुझे बनाना चाहते हैं।"
सामाजिक पहचान
भावनात्मक पहचान
आंतरिक पहचान
अमित का संकट गहराता गया। उसने अपने मित्र राजेश से बात की, जो एक मनोवैज्ञानिक था।
"मैं अपने आप को भूल रहा हूँ, राजेश," अमित ने कहा। "मुझे लगता है कि मैं वह नहीं हूँ जो मैं दिख रहा हूँ।"
राजेश ने अमित को एक अभ्यास सुझाया: "अगले सात दिनों तक, हर दिन एक घंटे के लिए सब कुछ छोड़कर बैठ जाओ। और बार-बार अपने आप से पूछो: 'मैं कौन हूँ?' जो भी जवाब मन में आए, उसे नोट करो, लेकिन उस पर विश्वास मत करो। बस पूछते रहो।"
आत्म-खोज की 7-दिवसीय यात्रा
मैं नहीं हूँ
वे सभी भूमिकाएँ और लेबल जिन्हें मैंने अपना समझ लिया था, उन्हें छोड़ना शुरू करो
मैं क्या नहीं हूँ
नकारात्मक पहचान करो कि तुम क्या नहीं हो—नाम नहीं, शरीर नहीं, विचार नहीं
शून्य में रहना
किसी भी पहचान के बिना, खालीपन में रहने का अनुभव करो
साक्षी बनना
विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं का निष्पक्ष साक्षी बनो
शुद्ध अस्तित्व
बिना किसी विशेषण के, सिर्फ "होने" का अनुभव करो
सार्वभौमिकता
अपने आप को सब कुछ के साथ एक महसूस करो
वापसी
वापस लौटो, लेकिन अब जानते हुए कि तुम कौन हो
अमित ने यह अभ्यास शुरू किया। पहले दिन उसने अपनी डायरी में लिखा: "मैं अमित हूँ। मैं एक इंजीनियर हूँ। मैं एक पिता हूँ।"
लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, उसके जवाब बदलने लगे। तीसरे दिन उसने लिखा: "मैं यह शरीर नहीं हूँ। मैं ये विचार नहीं हूँ। मैं ये भावनाएँ नहीं हूँ।"
पाँचवें दिन एक विशेष अनुभव हुआ। शाम के ध्यान के दौरान, अमित ने अचानक महसूस किया कि वह सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। एक अजीब सी शांति और विस्तार का अनुभव हुआ।
दर्पण अभ्यास
आईने के सामने बैठो
शांत जगह पर बैठकर अपने आप को आईने में देखो। पाँच मिनट तक बस देखते रहो। कोई निर्णय न दो, कोई विचार न बनाओ।
प्रश्न पूछो
अपने आप से पूछो: "मैं कौन हूँ?" जो भी जवाब मन में आए, उसे आईने में बोलो। फिर पूछो: "क्या मैं सचमुच वही हूँ?"
परतें हटाओ
पहली परत: "मैं यह नाम नहीं हूँ।" दूसरी परत: "मैं यह शरीर नहीं हूँ।" तीसरी परत: "मैं ये विचार नहीं हूँ।" चौथी परत: "मैं ये भावनाएँ नहीं हूँ।"
शेष क्या बचता है?
जब सब कुछ हटा दिया जाए, तब क्या बचता है? उस शेष को महसूस करो। उस शुद्ध अस्तित्व को अनुभव करो जो किसी भी परिभाषा से परे है।
सात दिन बाद अमित राजेश से मिला। उसके चेहरे पर एक अलग ही शांति और स्पष्टता थी।
"कैसा रहा?" राजेश ने पूछा।
"मैंने पाया कि मैं वह नहीं हूँ जो मैं सोचता था कि मैं हूँ," अमित ने कहा। "और जो मैं हूँ, उसे शब्दों में बताना असंभव है।"
"बिल्कुल सही!" राजेश ने कहा। "जो तुम हो, वह शब्दों से परे है। वह परिभाषाओं से परे है। वह अनुभव का विषय है, वर्णन का नहीं।"
मैं कौन हूँ? — गहरे प्रश्न
अपने आप से ये प्रश्न पूछकर आत्म-जागरूकता की यात्रा शुरू करें:
मैं क्या हूँ?
अपनी पहचान की सभी परतों को हटाकर देखें कि मूल रूप से आप क्या हैं। नाम, शरीर, विचार, भावनाएँ—ये सब हटाने के बाद क्या बचता है?
कौन देख रहा है?
जब आप कुछ देखते हैं, तो कौन देख रहा है? जब आप सोचते हैं, तो कौन सोच रहा है? यह "साक्षी" कौन है जो सब कुछ देख रहा है लेकिन स्वयं देखा नहीं जा सकता?
क्या मैं समय में हूँ?
क्या आपका वास्तविक स्वयं बदलता है? बचपन का आप, युवावस्था का आप, वृद्धावस्था का आप—क्या ये सब अलग-अलग हैं? या एक ही साक्षी है जो सब कुछ देख रहा है?
अमित की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उसने एक छोटा समूह बनाया—"मैं कौन हूँ?" क्लब। इसमें वे लोग आते हैं जो अपनी पहचान के संकट से गुजर रहे हैं या जो अपने वास्तविक स्वयं को जानना चाहते हैं।
हर सप्ताह वे एक सवाल पर चर्चा करते हैं: "क्या हम वही हैं जो हम सोचते हैं कि हम हैं?"
क्योंकि सबसे बड़ा सच यह है कि हम सभी अपने आप को भूल गए हैं। हम अपनी भूमिकाओं में इतने खो गए हैं कि अभिनेता को ही भूल गए हैं। और जब तक हम यह नहीं जानते कि हम कौन हैं, हमारी सारी सफलताएँ, सारी संपत्तियाँ, सारे रिश्ते—सब खोखले हैं।
आज अमित वही काम करता है, वही घर में रहता है, वही परिवार के साथ है। लेकिन अब वह जानता है कि वह इन सबसे अधिक है। वह इन भूमिकाओं को निभा रहा है, लेकिन वह इन भूमिकाओं से स्वयं को अलग जानता है।
अमित अक्सर कहता है: "मैं भूल गया था कि मैं कौन हूँ। और इस भूलने में ही मैंने खुद को पा लिया।"