अरुण ने अपना बैग उठाया और स्टेशन से बाहर निकला। रात के दो बजे थे। शहर सोया हुआ था, सिवाय कुछ दूर के रोशनी के बिंदुओं के। उसने कोई होटल ढूँढ़ने की कोशिश की, लेकिन सब बंद थे। यह एक अनजान शहर था, और अरुण अकेला था।
कुछ देर पहले तक वह एक नौकरी में था, एक परिवार में था, एक जीवन में था। अब वह सब खत्म हो चुका था। नौकरी चली गई थी, पत्नी अलग हो गई थी, और अर्थ खो गया था। अरुण ने फैसला किया था कि वह भागेगा—अपने आप से, अपने अतीत से, अपने दर्द से।
अरुण सड़क पर चलने लगा। ठंडी हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी। उसे याद आया कि कैसे तीन साल पहले उसने इस शहर में नौकरी शुरू की थी। उस समय वह उत्साहित था, आशावादी था। अब वही शहर उसे अजनबी लग रहा था।
पूर्णिमा
पूरी रोशनी, पूरा विश्वास
अर्धचंद्र
आधा अंधेरा, आधा उजाला
अमावस्या
पूरा अंधेरा, नई शुरुआत
सूर्योदय
अंधेरे का अंत, नया दिन
अरुण एक पार्क में पहुँचा। वहाँ एक बेंच पर बैठ गया। उसने अपने फोन को देखा—कोई मैसेज नहीं, कोई कॉल नहीं। दुनिया ने उसे भुला दिया था, या शायद उसने दुनिया को भुला दिया था।
अरुण की रात्रि यात्रा
रात 2:00
स्टेशन से निकलना
अकेलापन
रात 2:45
शहर की सड़कों पर
भटकना
रात 3:30
पार्क में बैठना
प्रतिबिंब
रात 4:15
वृद्ध व्यक्ति से मुलाकात
सीख
सुबह 5:30
सूर्योदय देखना
आशा
तभी उसने एक आवाज सुनी। पार्क के दूसरे कोने से हल्की सीटी की आवाज आ रही थी। अरुण ने देखा—एक वृद्ध व्यक्ति बेंच पर बैठा था, एक थैला उसके पास रखा था। वह व्यक्ति तारों की ओर देख रहा था और सीटी बजा रहा था।
रात्रि आकाश का संदेश
अरुण ने पहली बार रात के आकाश को ध्यान से देखा। तारे टिमटिमा रहे थे, चंद्रमा आधा दिख रहा था। वृद्ध व्यक्ति ने उसकी ओर देखा और मुस्कुराया।
अरुण ने पास जाकर बैठने का इशारा किया। वृद्ध व्यक्ति ने सिर हिलाया। "बैठो, बेटा। रात अभी लंबी है।"
वृद्ध व्यक्ति ने अपना परिचय दिया—उसका नाम प्रकाश था। विडंबना देखो—जिसका नाम प्रकाश था, वह रात में बैठा था। प्रकाश ने बताया कि वह सड़कों पर रहता है, लेकिन खुश है।
"तुम दुखी लगते हो," प्रकाश ने कहा। अरुण ने अपनी कहानी सुनाई—नौकरी का जाना, शादी का टूटना, अर्थ का खोना। प्रकाश चुपचाप सुनता रहा।
प्रकाश ने अपना थैला खोला और दो सेब निकाले। एक अरुण को दिया। "खाओ। भूखे पेट कोई फैसला मत करो।"
सेब खाते हुए प्रकाश ने कहानी सुनानी शुरू की। वह भी कभी अमीर था, परिवार था, मकान था। फिर एक दुर्घटना में सब कुछ खो दिया। पत्नी और बच्चे चले गए, व्यवसाय डूब गया। वह भी अंधेरे में भटकता रहा।
"मैंने सोचा था कि अंधेरा ही अंत है," प्रकाश ने कहा। "लेकिन फिर मैंने समझा—अंधेरा अंत नहीं, शुरुआत है। जब सब कुछ अंधेरा हो जाता है, तभी हम अपने भीतर की रोशनी देख पाते हैं।"
प्रकाश की कहानी
प्रकाश ने बताया कि कैसे उसने रातों को अपना शिक्षक बनाया। हर रात वह एक नई सीख लेकर सोता था:
दूसरी रात: तारे हमेशा रहते हैं, बादल सिर्फ छुपाते हैं।
तीसरी रात: चाँद खुद नहीं चमकता, सूरज की रोशनी परावर्तित करता है।
चौथी रात: सबसे गहरा अंधेरा सूर्योदय से ठीक पहले होता है।"
अरुण सुनता रहा। उसे लगा जैसे वह सालों बाद सही बात सुन रहा है। प्रकाश ने कहा, "तुम्हारा नाम अरुण है—यानी सूर्योदय। और तुम अंधेरे में भटक रहे हो? विडंबना देखो।"
धीरे-धीरे रात कम होने लगी। पूर्व दिशा में हल्की लाली दिखाई देने लगी। प्रकाश ने इशारा किया, "देखो, सवेरा हो रहा है। तुम्हारा नाम सच हो रहा है।"
अरुण और प्रकाश चुपचाप सूर्योदय देखते रहे। आकाश धीरे-धीरे नारंगी, फिर पीला, फिर सुनहरा होता गया। पक्षी चहचहाने लगे। शहर जागने लगा।
प्रकाश ने उठने का इशारा किया। "मेरा सफर जारी है। तुम्हारा भी जारी रहेगा। बस याद रखना—हर रात एक सवेरे की प्रतीक्षा में है। और हर अंधेरा तुम्हें तुम्हारी रोशनी दिखाने आता है।"
प्रकाश ने अपना थैला उठाया और चल दिया। चलते-चलते उसने मुड़कर कहा, "अरुण, तुम्हारे भीतर का सूरज कभी डूबा नहीं है। बादलों ने सिर्फ ढक लिया है। बादल हट जाएँगे।"
अरुण अकेला रह गया, लेकिन अब वह अकेला नहीं लग रहा था। उसने महसूस किया कि उसके भीतर कुछ जाग रहा है। वह स्टेशन की ओर लौटा, लेकिन इस बार भागकर नहीं, चलकर।
स्टेशन पर उसने एक टिकट खरीदी—घर की ओर। नहीं, उस घर की ओर नहीं जो उसने खोया था। उस घर की ओर जो उसके भीतर था।
ट्रेन में बैठकर अरुण ने फोन निकाला। उसने एक मैसेज टाइप किया: "मैं वापस आ रहा हूँ। नहीं, बदला हुआ वापस आ रहा हूँ।" मैसेज उसकी बहन को भेजा। फिर उसने एक नोटबुक निकाली और लिखना शुरू किया: "रात का यात्री—दिन 1: अंधेरा डरावना नहीं, अज्ञात होता है।"
क्योंकि कभी-कभी हमें रात के अंधेरे में भटकना पड़ता है ताकि हम अपने भीतर के सूरज की कीमत समझ सकें। और कभी-कभी हमें एक अजनबी की जरूरत होती है ताकि हम खुद से मिल सकें।