सारंग एक संगीतकार था। सितार वादन में उसकी गहरी पकड़ थी। लोग दूर-दूर से उसका संगीत सुनने आते थे। लेकिन एक दिन एक हादसे ने उसकी जिंदगी बदल दी—उसने अपनी सुनने की शक्ति खो दी। बहरा हो गया।
सारंग टूट गया। उसका सितार अलमारी में धूल खाने लगा। उसने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। दुनिया से कट गया। उसके मित्र और शिष्य आते, लेकिन वह किसी से बात नहीं करता था। उसे लगता था—‘अब मैं अधूरा हूँ। बिना कानों के संगीत कैसे बन सकता है?’
महीनों बीत गए। एक दिन उसकी छोटी बेटी कविता उसके पास आई। उसने अपने पिता का सितार उठाया और एक तार छेड़ा। सारंग को कुछ सुनाई नहीं दिया, लेकिन उसने सितार की तारों को हिलते देखा। उसने अपने हाथ बढ़ाए, और तारों को छुआ। कंपन उसकी उँगलियों तक पहुँचा। वह चौंक गया।
उस दिन से सारंग ने फिर से सितार उठाया। अब वह कानों से नहीं, उँगलियों से ‘सुनता’ था। तारों के कंपन, उनकी थिरकन, उनकी गूंज—वह सब उसकी उँगलियों तक पहुँचता था। उसने एक नया संगीत बनाया—मौन का संगीत।
जब सारंग ने पहली बार अपना नया संगीत प्रस्तुत किया, तो हॉल खचाखच भरा था। लोगों को पता था कि वह बहरा है, लेकिन वे यह देखने आए थे कि एक बहरा संगीतकार कैसे संगीत बना सकता है। सारंग ने सितार उठाया, और बजाना शुरू किया। कोई आवाज़ नहीं थी। पूरा हॉल सन्नाटे में डूब गया। लोग हैरान थे।
लेकिन फिर, धीरे-धीरे, उन्होंने महसूस किया—सन्नाटे में भी एक संगीत है। सारंग की उँगलियाँ तारों पर ऐसे चल रही थीं जैसे कोई कविता लिख रहा हो। और जब उसने बजाना बंद किया, तो हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट हुई। कोई सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन सब सुन रहे थे।
आज सारंग एक प्रेरणा है। वह उन बच्चों को सिखाता है जो किसी न किसी वजह से ‘अलग’ महसूस करते हैं। वह उनसे कहता है— “अगर तुम कुछ नहीं सुन सकते, तो महसूस करो। अगर तुम कुछ नहीं देख सकते, तो सुनो। अगर तुम कुछ नहीं बोल सकते, तो लिखो। हर कमी एक नई ताकत छुपाती है।”
तो अगर आज आपको लगता है कि आपमें कुछ कमी है, कुछ टूटा है—तो याद रखिए, मौन भी एक स्वर है, और हर टूटन एक नए संगीत की शुरुआत है। बस उसे पहचानने की जरूरत है।