बाजार से सटी एक पुरानी इमारत की तीसरी मंजिल पर रहने वाली इंदिरा दीदी के पास एक अलमारी थी—जितनी पुरानी, उतनी ही रहस्यमयी। उस अलमारी में कपड़े कम, फ़ाइलें ज्यादा रहती थीं। बच्चे अक्सर पूछते, “दीदी, इन फ़ाइलों में क्या है?” तो वह मुस्कुराकर कहतीं, “सपने।”
इंदिरा दीदी का अपना कोई परिवार नहीं था। वह अकेली रहती थीं, लेकिन पूरे मोहल्ले की “दीदी” थीं। कभी किसी बच्चे की पढ़ाई, कभी किसी युवती की शादी, कभी किसी बुज़ुर्ग की दवा—वह हर मदद के लिए तैयार रहतीं। लोग कहते, “दीदी के पास जादू है।”
बात सच थी। इंदिरा दीदी के पास एक डायरी नहीं, बल्कि फ़ाइलों का एक संग्रह था। हर फ़ाइल पर एक लेबल लगा था— “1985: छोटी सी दुकान”, “1990: पढ़ाई का खर्च”, “1995: बेटी की शादी”, “2000: नया घर”। ये उन सपनों की फ़ाइलें थीं, जो उन्होंने दूसरों के लिए देखे थे।
एक दिन मोहल्ले में एक नया लड़का आया—आकाश। वह बहुत प्रतिभाशाली था, लेकिन उसकी जेब में पैसे नहीं थे। उसे एक नेशनल लेवल की प्रतियोगिता में जाना था, पिता बीमार थे, माँ परिवार चलाती थीं। आकाश ने हिम्मत छोड़ दी थी।
इंदिरा दीदी को पता चला। उन्होंने आकाश को अपने घर बुलाया। अलमारी खोली, एक फ़ाइल निकाली—उस पर लिखा था “2024: आकाश की उड़ान”। आकाश चौंक गया। “दीदी, यह क्या है?”
उन्होंने आकाश को एक लिफाफा दिया। उसमें प्रतियोगिता की फीस, ट्रेन का किराया और थोड़ा खर्चा था। आकाश की आँखें नम हो गईं। “दीदी, यह पैसा... मैं कैसे लौटाऊँगा?”
इंदिरा दीदी ने अलमारी की तरफ इशारा किया— “जब तुम कामयाब हो जाओ, तो किसी और के लिए एक फ़ाइल बनाना। यही इसका सूद होगा।”
आकाश गया, प्रतियोगिता जीता, और लौटकर आईआईटी में दाखिला लिया। आज वह एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर है। लेकिन उसने वादा निभाया—उसने अपने मोहल्ले के दस बच्चों के लिए एक फंड बनाया, जिसका नाम रखा “सपनों की फ़ाइल”।
एक और कहानी थी उस फ़ाइल की, जिस पर लिखा था— “1978: खुद का घर”। इंदिरा दीदी ने जवानी में सपना देखा था कि वह अपना घर खरीदेंगी। लेकिन हालात ऐसे बने कि पैसे बच नहीं पाए। वह फ़ाइल अलमारी में दबी रह गई। सालों बीत गए।
एक दिन उनके पास एक युवक आया—वही बच्चा, जिसकी पढ़ाई का खर्च उन्होंने सालों पहले उठाया था। अब वह बड़ा हो गया था, और उसने अपनी कंपनी खोल ली थी। वह इंदिरा दीदी के पास एक चाबी रख गया—एक छोटे से फ्लैट की चाबी। बोला, “दीदी, यह आपके उस सपने की फ़ाइल है, जो अधूरी रह गई थी। मैंने इसे पूरा किया है।”
इंदिरा दीदी रो पड़ीं। उनकी वह पुरानी फ़ाइल, जिसे उन्होंने कभी बंद कर दिया था, किसी और के सपने ने खोल दी थी।
आज इंदिरा दीदी नहीं हैं। लेकिन उनकी अलमारी अब भी है—उसी पुराने कमरे में। अब उस अलमारी की देखभाल आकाश और उसके दोस्त करते हैं। अलमारी में अब नई फ़ाइलें जुड़ गई हैं— “2025: नया स्कूल”, “2026: छात्रवृत्ति”, “2030: महिला उद्यमी”। हर फ़ाइल किसी न किसी सपने का रिकॉर्ड है।
उस अलमारी के ऊपर आज एक तख्ती लगी है, जिस पर लिखा है:
अब जब भी मोहल्ले में कोई निराश होता है, लोग उसे अलमारी के पास ले जाते हैं। वहाँ बैठकर वह अपने सपने की फ़ाइल बनाता है। हो सकता है वह फ़ाइल आज न खुले, हो सकता है कल खुले, या हो सकता है उसे कोई और खोले। लेकिन वह फ़ाइल बनती जरूर है। क्योंकि हर सपना एक नई फ़ाइल है, जिसे सेव करना चाहिए।
और शायद यही आशा की सबसे बड़ी ताकत है—कि सपने कभी खत्म नहीं होते। वे बस फ़ाइलों में बदल जाते हैं, और किसी न किसी दिन, किसी न किसी के हाथों, खुल ही जाते हैं।